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परमार्थ-साधन के आठ विघ्न -२-


      || श्रीहरिः ||

आज की शुभतिथि-पंचांग

श्रावण कृष्ण, द्वितिया, बुधवार, वि० स० २०७०

 
गत ब्लॉग से आगे...विलासिता-विलासी पुरुष को मौज-शौक के समान जुटाने से ही फुरसत नहीं मिलती, वह साधन कब करे ! पहले सामान इक्कठा करना, फिर उससे शरीर को सजाना-यही उसका प्रधान कार्य होता है | कभी साधु-महात्मा का संग करता है तो उसकी क्षणभर की यही इच्छा होती है की मैं भी भजन करूँ; परन्तु विलासिता उसको ऐसा नहीं करने देती | भांति-भाँती के नए-नये फैशन के समान संग्रह करना और उनका मूल्य चुकाने के लिए अन्याय और असत्य की परवा न करते हुए  धन कमाने में लगा रहना-इन्ही में उसका जीवन बीतता है | शौक़ीन मनुष्यों को धन का अभाव तो प्राय: बना ही रहता है; क्योकि वह आवश्यक-अनावश्यक का ध्यान छोड़कर जहाँ कहीं भी कोई शौक की बढ़िया चीज देखता है, उसी को खरीद लेता है या खरीदना चाहता है | न रुपयों की परवाह करता है न अन्य किसी प्रकार का परिणाम सोचता है | सुन्दर मकान, बढ़िया-बढ़िया बहुमूल्य महीन वस्त्र, सुन्दर वस्त्र, इत्र्फुलेल, कन्घे, दर्पण, जूते, घडी, छडी, पाउडर आदि की तो बात ही क्या, खाने-पहनने, बिछोने, बैठने, चलने-फिरने, सूँघने-देखने और सुनने-सुनाने आदि सभी प्रकार के समान उसे बढ़िया-से-बढ़िया और सुन्दर-से-सुन्दर चाहिये | वह रात-दिन इन्हींकी चिन्तामें लगा रहता है | वैराग्य तो उसके पास भी नहीं फटकने पाता | शेष अगले ब्लॉग में ...    

 श्रद्धेय हनुमानप्रसाद पोद्धार भाईजी, भगवतचर्चा पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर, उत्तरप्रदेश , भारत  

नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!    

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