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मानव-जन्म सुदुर्लभ पाकर, भजे नहीं मैंने भगवान् ।


|| श्रीहरिः ||

आज की शुभतिथि-पंचांग

भाद्रपद शुक्ल, एकादशी, बुधवार, वि० स० २०७०

मानव-जन्म सुदुर्लभ पाकर, भजे नहीं मैंने भगवान् ।

(राग जंगला-तीन ताल)

 

मानव-जन्म सुदुर्लभ पाकर, भजे नहीं मैंने भगवान् ।

रचा-पचा मैं रहा निरन्तर, मिथ्या भोगोंमें सुख मान॥

मान लिया मैंने जीवनका लक्ष्य एक इन्द्रिय-सुख-भोग।

बढ़ते रहे सहज ही इससे नये-नये तन-मनके रोग॥

बढ़ता रहा नित्य कामज्वर, ममता-राग-मोह-मद-मान।

हु‌ई आत्म-विस्मृति, छाया उन्माद, मिट गया सारा जान॥

केवल आ बस गया चितमें राग-द्वेष-पूर्ण संसार।

हु‌ए उदय जीवनमें लाखों घोर पतनके हेतु विकार॥

समझा मैंने पुण्य पापको, ध्रुव विनाशको बड़ा विकास।

लोभ-क्रएध-द्वेष-हिंसावश जाग उठा अघमें उल्लास॥

जलने लगा हृदयमें दारुण अनल, मिट गयी सारी शान्ति।

दभ हो गया जीवन-सबल, छायी अमित अमिट-सी भ्रान्ति॥

जीवन-संध्या हु‌ई, आ गया इस जीवनका अन्तिम काल।

तब भी नहीं चेतना आयी, टूटा नहीं मोह-जंजाल॥

प्रभो ! कृपा कर अब इस पामर, पथभ्रष्टस्न्पर सहज उदार।

चरण-शरणमें लेकर कर दो, नाथ ! अधमका अब उद्धार॥


श्रद्धेय हनुमानप्रसाद पोद्धार भाईजी, पदरत्नाकर पुस्तक से, गीताप्रेस गोरखपुर
नारायण ! नारायण !! नारायण !!! नारायण !!! नारायण !!!

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